Delhi riots 2020 -कहां खो गया इंसाफ,दिल्ली दंगे हिन्दू -मुस्लिम और बीजेपी

कहां खो गया इंसाफ

पांच साल पहले हुए दिल्ली के दंगे या कहें दिल्ली को जलाने की साज़िश के ज़ख़्म अभी नहीं भरे हैं…इंसाफ़ नहीं मिला है।

कहां खो गया इंसाफ़…इन पांच सालों में क्या कुछ हुआ। कई बेगुनाह आज भी जेल की सलाखों के पीछे हैं और कई आरोपी आज भी बाहर हैं, आजाद घूम रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का टिकट लेकर विधायक और मंत्री बन गए हैं।

दिल्ली /अटल हिन्द /राजकुमार अग्रवाल

आज से पांच साल पहले 23 फरवरी से 26 फरवरी, 2020 के बीच दिल्ली को जलाने की साजिश की गई थी। दिल्ली के उत्तर-पूर्वी हिस्से को हमले का शिकार बनाया गया था।जिसके चलते उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा में अब तक कम से कम 42 लोगों की मौत हो चुकी है जबकि 200 से अधिक लोग घायल हैं। हिंसा के सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने अब तक 254 प्राथमिकी दर्ज की है और 903 लोगों को गिरफ्तार किया है या हिरासत में लिया है।इस दंगे में क़रीब 53 लोगों की जान गई थी। सैकड़ों घायल हुए थे। चार दिनों तक चले इस दंगे में जान-माल का भारी नुकसान हुआ था। कई घर और दुकानें जलाकर खाक कर दी गई थी।आम बोलचाल में हम इसे दंगा कहते हैं लेकिन सही शब्दों का इस्तेमाल किया जाए तो यह एक हमला था। सीएए के विरोध में चले शाहीन बाग़ आंदोलन का बदला। आंकड़े इसकी गवाही देते हैं।दिल्ली पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि मरने वालों में 40 मुसलमान और 13 हिंदू थे।लेकिन अफ़सोस इस हमले, इस दंगे के लिए भी सरकार और मीडिया ने एकतरफा मुसलमानों को ही दोषी ठहराया। आज भी यही प्रचारित किया जाता है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच का कहना है कि दिल्ली दंगों (Delhi riots 2020Delhi riots २०२०-)के पीछे एक गहरी साजिश थी, जिसकी नींव 2019 में सीएए और एनआरसी के प्रदर्शनों के दौरान पड़ी। इस साजिश का ज़िक्र एफआईआर नंबर 59/2020 में किया गया है। दिल्ली पुलिस जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड मानती है।विशेष लोक अभियोजक अमित प्रसाद ने दलील दी कि यह दंगा उस वक्त के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत दौरे के वक्त हिंसा पैदा करने की साजिश का हिस्सा था।दंगों की शुरुआत उत्तर पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद में हुई थी, जहां सीलमपुर - जाफराबाद - मौजपुर मार्ग पर नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के ख़िलाफ़ महिलाएं धरना दे रहीं थीं।

उस समय भाजपा के नए नवेले नेता, कपिल मिश्रा ने दिल्ली पुलिस से सड़कों को खाली करने का आह्वान किया, जिसमें उन्होंने अपने समर्थकों की मदद से ख़ुद ऐसा करने की धमकी दी। इसके बाद ही दिल्ली में हिंसा भड़क उठी।इसके अलावा फरवरी 2020 में ही हुए चुनाव में भाजपा ने तमाम कोशिशों के बाद भी मुंह की खाई थी। तमाम जानकार कहते हैं कि इस हार से भी भाजपा बौखला गई थी। (इस बार इस हार का बदला ले लिया गया है। और 27 साल बाद भाजपा पूर्ण बहुमत से एक बार फिर दिल्ली की सत्ता में आ गई है।)

इस तरह दंगों की भूमिका पहले ही बन चुकी थी लेकिन इसकी बलि चढ़े कई निर्दोष लोग।दिल्ली दंगों की हक़ीक़त पर 2022 में चार पूर्व जजों और देश के एक पूर्व गृह सचिव ने फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट जारी की थी।रिपोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल उठाए थे। साथ ही केंद्रीय गृह मंत्रालय, दिल्ली सरकार और मीडिया की भूमिका पर भी सख्त टिप्पणियां की गई थीं।इसी फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग रिपोर्ट में बीजेपी नेताओं जैसे कपिल मिश्रा के दिए हुए भाषण के लिए कहा गया था कि उन्होंने भी लोगों को उकसाया था, जिससे हिंसा भड़की थी।सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने दिल्ली के पटियाला कोर्ट में एक याचिका डाल कर कहा था कि कपिल मिश्रा के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज होनी चाहिए। ये याचिका अभी कोर्ट में लंबित है।





वहीं जुलाई 2020 में दिल्ली पुलिस ने दिल्ली हाई कोर्ट में कहा था कि बीजेपी नेता कपिल मिश्रा और बाक़ी बीजेपी नेताओं के खिलाफ ऐसे कोई सबूत नहीं मिले हैं कि उनके भाषण से दंगा भड़का हो।अब यही कपिल मिश्रा दिल्ली चुनाव में भाजपा के टिकट पर करावल नगर से चुनाव लड़कर विधायक और मंत्री बन गए है। लेकिन मीडिया में दंगों में उनकी भूमिका पर कोई चर्चा नहीं है।तमाम मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस ने दंगों से जुड़ी कुल 758 एफआईआर दर्ज की है।

2024 में छपी रिपोर्टों के मुताबिक इनमें तब तक कुल 2619 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी, जिनमें से 2094 लोग जमानत पर बाहर हैं।अदालत ने अब तक सिर्फ़ 47 लोगों को दोषी पाया है और 183 लोगों को बरी कर दिया।

वहीं 75 लोगों के खिलाफ पर्याप्त सबूत ना होने के कारण कोर्ट ने उनका मामला रद्द कर दिया है।दिल्ली दंगों में ड्यूटी के दौरान मारे गए हेड कॉन्स्टेबल रतन लाल के मामले में दिल्ली पुलिस ने अब तक कम से कम 24 लोगों को गिरफ्तार किया, जिनमें से 10 जमानत पर रिहा हो गए हैं।

वहीं इंटेलिजेंस ब्यूरो में काम करने वाले अंकित शर्मा की हत्या मामले में 11 अभियुक्त फिलहाल गिरफ़्तार हैं। अंकित शर्मा का शव चांद बाग़ के एक नाले में 26 फरवरी, 2020 को मिला था।लेकिन जैसे फैक्ट फाइंडिंग टीम का कहना है कि दिल्ली दंगों में एक और आरोपी है और वह है दिल्ली पुलिस। इन दंगों को होने देने और रोकने में देरी के लिए दिल्ली पुलिस की भूमिका पर लगातार सवाल उठे हैं। साथ ही उस पर बर्बरता के भी आरोप हैं।सितंबर 2024 में दंगों के एक मामले में कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की 'थ्योरी' पर सवाल उठाते हुए 10 अभियुक्तों को सभी मामलों से बरी कर दिया था। यह सभी मुस्लिम समुदाय से थे।इन सभी अभियुक्तों पर आरोप लगाए गए थे कि दंगों के दौरान उन्होंने उत्तर पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी थाने क्षेत्र के एक घर और दुकान पर हमला किया था।दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश पुलस्त्य प्रमचाला ने कहा कि 'अभियुक्तों के खिलाफ लगे आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए।'इन चार-पांच सालों में कई बार अदालत में सुनवाई के दौरान ऐसे मौके आए, जब कोर्ट ने दिल्ली पुलिस पर सख्त टिप्पणी की और उनकी जांच के स्तर को खराब बताया।

अगस्त, 2023 में दयालपुर पुलिस थाना की एफआईआर नंबर 71/20 केस में तीन लोगों की दंगा फैलाने के मामले में हुई गिरफ्तारी पर सुनवाई करते हुए कड़कड़डूमा कोर्ट ने कहा था, ''इन घटनाओं की ठीक से और पूरी तरह से जांच नहीं की गई है। मामले में चार्जशीट पूर्वाग्रह और गलत तरीके से दायर की गई है ताकि शुरुआत में हुई गलतियों को छिपाया जा सके।''सितंबर 2021 में दिल्ली के कड़कड़डूमा अदालत ने टिप्पणी की थी, ''आजादी के बाद हुए दिल्ली के सबसे भीषण सांप्रदायिक दंगे को इतिहास देखेगा, तो इसमें जांच एजेंसियों की नाकामी पर लोकतंत्र समर्थकों का ध्यान जाएगा कि किस तरह से जांच एजेंसियां वैज्ञानिक तौर तरीके का इस्तेमाल नहीं कर पाईं।''

पुलिस की इस जांच और रवैये की वजह से कई नौजवान आज भी जेलों में बंद हैं।

नवंबर 2024 की ख़बर है कि सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों की आरोपी गुलफिशा फातिमा को अपनी तरफ से जमानत देने से मना किया, लेकिन दिल्ली हाई कोर्ट से कहा कि वह गुलफिशा की बेल याचिका पर जल्द सुनवाई करे।गुलफिशा के लिए पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल का कहना था कि वह 4 साल से जेल में है। काफी समय से हाई कोर्ट में जमानत याचिका लंबित है।इससे पहले 25 अक्टूबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने दंगों के एक और आरोपी शरजील इमाम के मामले में भी यही आदेश दिया था।

हालांकि मार्च 2022 में ही दंगों में आरोपी पार्षद इशरत जहां को जमानत मिल गई। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने इशरत जहां को UAPA के तहत गिरफ्तार किया था। कांग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहां की तरफ से अदालत में जमानत याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में कहा गया था कि पुलिस के पास इशरत के खिलाफ एक भी सबूत नहीं है।इससे पहले जून 2021 में दंगे के ही आरोप में यूएपीए की धाराओं में गिरफ्तार पिंजरा तोड़ कार्यकर्ता देवांगना कलीता, नताशा नरवाल और जामिया के छात्र आसिफ इक़बाल तन्हा को दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी।

उस समय हाईकोर्ट ने कहा था कि भड़काऊ भाषण देना या चक्का जाम करना उस समय असामान्य बात नहीं है, जब सरकार व संसद के कार्यों का व्यापक स्तर पर विरोध हो रहा हो। अगर हम मान भी लें कि भड़काऊ भाषण, चक्का जाम, महिलाओं को प्रदर्शन के लिए उकसाना और अन्य कार्य जिनका आरोप हैं, अगर संविधान में दिए गए शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की सीमा का उल्लंघन करते हैं, तब भी आतंकी कृत्य, उसकी साजिश या उसकी तैयारी के दायरे में नहीं कहे जाएंगे।

लेकिन ऐसी सुविधा, टिप्पणियां और जमानत उमर खालिद के नसीब नहीं हुईं–

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल और क्राइम ब्रांच उमर खालिद को दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड मानती है। उमर सितंबर 2020 से जेल में हैं। उनके ऊपर यूएपीए के तहत आतंकवाद, दंगा फैलाने और आपराधिक साजिश रचने जैसे कई आरोप लगे हैं। इस केस में अब तक मुकदमा शुरू नहीं हो पाया है।उमर खालिद की जमानत याचिका दो बार दो अलग-अलग अदालतों से खारिज हो चुकी है।सुप्रीम कोर्ट में उनकी जमानत याचिका मई 2023 से जनवरी 2024 तक लंबित रही, लेकिन एक बार भी उस पर बहस शुरू नहीं हो पाई। इसके बाद हारकर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अपनी जमानत की अर्जी वापस ले ली है और ये कहा है कि वो अब वापस ट्रायल कोर्ट जाएंगे।अब 20 फरवरी 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट में उमर खालिद की जमानत याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान उमर के वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा कि महज व्हाट्सएप ग्रुप का सदस्य होना किसी अपराध में शामिल होने का सबूत नहीं है।उमर के वकील त्रिदिप पेस ने अदालत से कहा कि उमर खालिद लंबे समय से विचाराधीन कैदी के रूप में हिरासत में है। उन्होंने कहा कि ट्रायल में देरी भी एक वजह है, जिसके चलते उमर खालिद को जमानत मिलनी चाहिए। पेस ने कहा कि इस मामले के जिन चार आरोपियों को जमानत मिली है, उनसे समानता के आधार पर उमर खालिद को भी जमानत मिलनी चाहिए।

जस्टिस नवीन चावला की अध्यक्षता वाली बेंच ने अब जमानत याचिका पर अगली सुनवाई 4 मार्च को करने का आदेश दिया है।

तो इस तरह देखा जाए कि दिल्ली दंगे के बाद पांच साल कैसे आगे बढ़े और इंसाफ़ कहां पहुंचा तो सिर्फ़ इतना ही कहा जा सकता है कि एक आरोपी उमर खालिद या फिर गुलफिशा या शरजील इमाम को अभी तक जमानत नहीं मिली और एक आरोपी (हालांकि दिल्ली पुलिस उन्हें आरोपी नहीं मानती) कपिल मिश्रा विधायक बनकर दिल्ली सरकार में क़ानून व न्याय मंत्री बन गए हैं। इसी के साथ उन्हें विकास, कला और संस्कृति विभाग, भाषा विभाग, पर्यटन विभाग, श्रम विभाग और रोजगार विभाग मिला है।

आज 24 फरवरी से दिल्ली की नई विधानसभा का सत्र शुरू हो गया है। और सबसे पहले सदन के पटल पर सीएजी की रिपोर्ट रखी जानी हैं, अच्छा होता कि सबसे पहले दिल्ली दंगों में जांच की प्रगति की रिपोर्ट रखी जाती और बताया जाता कि इन पांच सालों में देश के गृह मंत्री अमित शाह के अंडर में आने वाली पुलिस ने इंसाफ़ के लिए क्या किया।

हिंसा की वजह एक नजर...

-22 फरवरी को रात करीब 10 बजे जाफराबाद मेट्रो के नीचे सीलमपुर-मौजपुर मुख्य सड़क पर सीएए के विरोध में महिलाएं बैठ गईं। रात के 12 बजे तक इनकी संख्या हजारों में पहुंच गई लेकिन एक तरफ का रास्ता खुला था वहां से गाड़ियों की आवाजाही जारी थी।

-23 फरवरी को महिलाओं का सड़क पर प्रदर्शन जारी रहा। इस दौरान एक बात साफ दिख रहा थी कि पुलिस इन प्रदर्शनकारियों से हटने के लिए अपील नहीं कर रही थी। 23 फरवरी को ही भीम आर्मी का भारत बंद का आह्वान था। इससे इन सभी आंदोलनों में और तेजी आई।

-23 फरवरी को सुबह 11 बजे के करीब चांद बाग़ में महिलाएं जो कि तकरीबन दो महीने से धरने पर बैठी थी, उन्होंने राजघाट की तरफ मार्च शुरू किया। हालांकि पुलिस ने इजाजत नहीं दी। इसके बाद ये लोग भी सर्विस रोड से हटकर मुख्य सड़क पर बैठ गए।

-23 फरवरी को ही दिन में 12:30 बजे के आसपास पूर्वी दिल्ली के खुरेजी में भी प्रदर्शन कर रही महिलाएं मुख्य सड़क पर आ गईं।

- 23 फरवरी को दिन में 3 बजे कपिल मिश्रा के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में हिंदुत्ववादी उग्र भीड़ आई। यह भीड़ सीएए के समर्थन में आई थी। इस भीड़ ने कुछ मिनटों में ही मौजपुर सीलमपुर की दोनों मुख्य सड़क को बन्द कर दिया। इस दौरान उन्होंने कई आपत्तिजनक नारे भी लगाए। बार-बार वो भीड़ पुलिस से सीएए के विरोधियों को मारने की बात कर रही थी। इसके साथ ही वो मोदी-मोदी के नारे भी लगा रही थी।

- 23 फरवरी को 4 बजे के करीब पुलिस के डीसीपी आए और उन्होंने कपिल मिश्रा से बात की। इसके बाद कपिल मिश्रा ने उनके सामने ही भड़काने वाली बात कही और धमकी देते हुए कहा कि अगर तीन दिन में रास्ता साफ नहीं हुआ तो वो फिर किसी की नहीं सुनेंगे।

- 23 फरवरी को शाम साढ़े चार बजे कपिल मिश्रा के वापस जाने की अपील के बाद भी लोग सड़क पर ही रहे। इस दौरान गाड़ी वालों को पीटा भी गया और मुस्लिम लोगों की पहचान कर उनके साथ दुर्व्यवहार शुरू हो गया। फिर इसी दौरान दोनों समूहों में पत्थरबाजी शुरू हो गई। हालांकि ये कह पाना मुश्किल है कि इसकी शुरुआत किधर से हुई।

- 23 फरवरी को शाम 5 बजे तक मौजपुर रेड लाइट से लेकर बाबरपुर मेट्रो स्टेशन तक का पूरा इलाका पत्थरबाजी और हुड़दंगियों के कब्जे में था। एक तरफ हिंदूवादी सीएए के समर्थक थे तो दूसरी तरफ मुस्लिम भीड़ थी जिसके साथ सीएए का विरोध कर रहे लोग थे। यहां की आबादी भी कुछ इस तरह थी कि एक तरफ हिंदू बहुल इलाके और दूसरी तरफ मुस्लिम बहुल इलाके थे। यह सब पूरी रात चलता रहा लेकिन पुलिस बल असहाय दिख रही थी। वो इस पर काबू नहीं पा रही थी। उस पर आरोप है कि उसने जानबूझकर ऐसा किया।

-23 फरवरी को रात 10 बजे पुलिस बल की मौजूदगी में मौजपुर चौक पर ट्रैक्टर से ईंट-पत्थर उतारे गए।

- 24 फरवरी सुबह तकरीबन 10 बजे चांद बाग के पास धरना स्थल पर पुलिस बल की मौजूदगी बढ़ी और उन्होंने प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिश की। इस बीच दक्षिणपंथी हिन्दू संगठन के लोग भी जय श्री राम और मोदी के नारे लगाते हुए सड़क पर आ गए। इसके बाद दोनों समूहों के बीच पत्थरबाजी शुरू हो गई।

- 24 फरवरी को तकरीबन 12 बजे भजनपुरा पेट्रोल पंप में आग लगी जो चांद बाग प्रदर्शन स्थल के दूसरी तरफ था। इस घटना के बाद आगजनी और हिंसा का दौर तेज हुआ। इसके बाद भजनपुरा मेन रोड पर मौजूद मजार में आग लगा दी गई। इन घटनाओं के बाद सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर दोनों समुदायों में अफवाहों का दौर शुरू हुआ। जिससे इस हिंसा ने एक दंगे की शक्ल ले ली।

-24 फरवरी को तकरीबन दो बजे भजनपुरा से थोड़ी दूर खजूरी में भी हिंसा शुरू हो गई। यहां मुस्लिमों को पहचानकर मारा जारहा था। इसके साथ उन सभी गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई और आग लगा दी गई जो गैर हिंदुओं की लगी।

-24 फरवरी शाम तीन बजे बड़ी संख्या में मुस्लिम पुरानी दिल्ली से अपने तीन दिन के इस्तेमा की आखिरी दुआ करके लौट रहे थे। उनपर दंगाइयों ने हमला करना शुरू कर दिया। लोगों के कपड़े टोपी देखकर मारना शुरू कर दिया। इससे बचने के लिए काफी लोगों ने पुस्ता रोड के नीचे जंगलों में शरण ली जिन्हें कई घंटो बाद वहां से सुरक्षित निकाला गया।

- 24 फरवरी को चार बजे खजूरी में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए। दोनों तरफ से पत्थरबाजी और आगजनी शुरू हो गई। पुलिस मूकदर्शक बनी रही। 24 फरवरी को लगभग 12 बजे कर्दमपुरी और बृजपुरी में पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े।

- 24 फरवरी को लगभग 12 बजे पेट्रोल पंप जलने के बाद ही लगभग उत्तर पूर्व के उन सभी इलाकों में हिंसा तेज़ हो गई जहां पिछले काफी समय से शांतिपूर्ण सीएए के खिलाफ प्रदर्शन चल रहे थे। 24 फरवरी को लगभग 8 बजे गोकुलपुरी में टायर मार्केट में आग लगा दी गई।

-हिंसा का यह दौर पूरी रात चलता रहा। उम्मीद थी कि अगले दिन पुलिस बल इस पर काबू कर लेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अगले दिन हिंसा और बड़े स्तर पर हुई। इसकी आग उन इलाकों तक भी गई जो सोमवार तक शांत थे।

- 25 फरवरी को करावल नगर पुस्ता रोड पर बड़े पैमाने में गाड़ियों में आग लगा दी गई और लोगों के साथ मारपीट की गई।

-25 फरवरी को 11 बजे खजूरी चौक पर एक बार फिर पत्थरबाजी का दौर शुरू हुआ।

- 25 फरवरी 11 बजे उग्र समूह ने पूरे सोनिया विहार में लाठी डंडे और रॉड सरिया के भ्रमण किया। उत्तेजक नारे लगाए इस दौरान उन्हें जो मुस्लिम दुकान दिखी उसमे या तो तोड़-फोड़ की या उसे आग के हवाले कर दिया। लेकिन स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप के कारण ये जल्द ही रुक गया। हालांकि इसके पहले इन दंगाइयों ने कई दुकानों में आग लगा दी थी।

-25 फरवरी को मुस्तफाबाद के शिव विहार में बड़े पैमाने में आगजनी हुई। इसमें लोगों के दुकान-मकान सब जल गए। इसके बाद बड़े पैमाने पर लोग यहां से अपना घर बार छोड़कर भागे।

-25 फरवरी को वृजपुरी-मुस्तफाबाद में कई स्कूलों को आग के हवाले कर दिया गया। 25 फरवरी को मौजपुर से लेकर करवल नगर तक पत्थरबाजी और फायरिंग की घटना होती रही। इस दौरान कई पत्रकार भी घायल हुए ।

-25 फरवरी को 11:30 बजे अमित शाह ने दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल के साथ मीटिंग की।

इसी दिन 3 बजे के करीब खबर आई कि अशोक नगर की एक मस्जिद पर हिंदूवादी संगठन के लोगों ने तोड़फोड़ की और उस पर से इस्लामी झंडे हटकर हिन्दू प्रतीकों को लगाने की कोशिश हुई।

- 25 फरवरी को शाम 5 बजे के आसपास शिव विहार में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। इस दौरान कई मकानों को आग के हवाले कर दिया गया। एक मस्जिद में आग लगा दी गई। इसी दिन शाम 7 बजे दिल्ली के इंडिया गेट पर सिविल सोसाइटी के लोगों ने धरना दिया।

- 25 फरवरी को 8 बजे के करीब एसएन श्रीवास्तव को स्पेशल कमिश्नर पुलिस लॉ एंड ऑर्डर नियुक्त किया गया। 25 फरवरी को देर रात जाफराबाद के सड़क से प्रदर्शनकारियों को हटा दिया गया।

- 26 फरवरी को 11 बजे सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को फटकार लगाई। उसी दिन 3 बजे के करीब पुलिस ने खुरेजी के प्रदर्शन स्थल से लोगों को हटाया। लगभग इसी वक्त राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने हिंसाग्रस्त इलाकों का दौर किया।

- 26 फरवरी को 4 बजे केजरीवाल ने भी हिंसाग्रस्त इलाकों का दौरा किया। इसके बाद से इन हिंसा ग्रस्त इलाकों में बड़े पैमाने पर हो रहा हिंसा का तांडव रुक गया था लेकिन अफवाहों के आधार पर छुटपुट हिंसा का दौर चल रहा था।

इनका तो मुकदमा भी शुरू नहीं हुआ

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार अभी कई लोग ऐसे हैं जिनके परिवार वाले जेल में बंद हैं. उनका तो मुकदमा भी शुरू नहीं हुआ है. ऐसा ही एक मामला एफआईआर संख्या 59/2020 का है. यह दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़ा है. पुलिस का आरोप है कि जब नागरिकता संशोधन अधिनियम या सीएए के खिलाफ दिसंबर 2019 में प्रदर्शन शुरू हुए तो इससे जुड़े एक्टिविस्ट और विद्यार्थियों ने दिल्ली में दंगे करवाने की साज़िश रची.

इस मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम, देवांगना कलिता जैसे कुल 20 अभियुक्त हैं. इनमें से छह को जमानत मिली है और बाक़ी अभी जेल में हैं. इन सब पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम यानी यूएपीए की धाराएं लगी हैं. यह आतंकवाद से जुड़ा कानून है. इसमें जमानत मिलना मुश्किल होता है.

इन्हीं में एक अभियुक्ति हैं, गुलफिशा फ़ातिमा. गुलफिशा भी सीएए से जुड़े प्रदर्शन में शामिल थीं. इन्होंने गाज़ियाबाद के इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट एजुकेशन से एमबीए किया है. उनकी ख़्वाहिश पीएचडी करने की थी.

पुलिस का आरोप है कि गुलफिशा उन बैठकों का हिस्सा थीं, जहाँ चक्का जाम और हिंसा करने की साजिश रची जा रही थी. यही नहीं, उन्होंने कुछ महिलाओं को पुलिस और हिंदुओं पर हमला करने के लिए पत्थर और मिर्ची पाउडर दिया था.

गुलफिशा अप्रैल 2020 से जेल में हैं. जब जेल गईं तब वह 28 साल की थीं. गुलफिशा के खिलाफ चार मामले हैं. इनमें से तीन में उन्हें जमानत मिल गई है.

सीलमपुर में रहने वाले उनके माता-पिता का कहना है कि वे बेसब्री से इन मामलों के ख़त्म होने का इंतज़ार कर रहे हैं. गुलफिशा के पिता सैयद तसनीफ़ हुसैन का कहना है कि उन्हें संविधान और अदालतों पर भरोसा है.

लेकिन वे कहते हैं, "दिन तो गुज़र जाते हैं लेकिन रातें नहीं कटती. कभी-कभी तो डर लगता है कि मिल भी पाऊँगा या नहीं. वह बाहर आए, उससे पहले कहीं मैं न चला जाऊँ."

तसनीफ़ हुसैन का कहना है, "कुछ पता नहीं कितना वक़्त लगेगा. हमें तो शुरू से लग रहा था, वह अब बाहर आएगी, अब बाहर आएगी.''

अपनी बेटी के बारे में बात करते वक़्त उदासी और गर्व से उनकी आँखें चमक उठती हैं. वे कहते हैं, "वह मेरा कोहिनूर है. अब चमक आएगी या ज़ंग लगेगा, इसका मुझे नहीं पता. लेकिन वह मेरा कोहिनूर है, जिसकी कोई कीमत नहीं है.''

बेटी के बारे में बात होते ही उनकी माँ शाकरा बेगम रो पड़ती हैं. वह कहती हैं, "न जाने इतनी बड़ी परेशानी कैसे आ गए. हम तो पढ़े-लिखे नहीं थे. इसलिए पढ़ाया था कि बच्चों को कहीं परेशानी न हो. अब पढ़ाने से इतनी बड़ी परेशानी आ गई कि कुछ पूछो मत."

उनकी बेटी जेल में बंद है पर माँ के लिए भी वक़्त मानो थम सा गया है. उनका कहना है, "हम भी वक़्त काट ही रहे हैं. इस चक्कर में आधे हो गए हैं."

माता-पिता की गुलफिशा से हर हफ्ते वीडियो कॉल पर बात होती है. अदालत में मुलाक़ात हो जाती है. दोनों का कहना है कि जेल में रहते हुए भी गुलफिशा ही इन दोनों का हौसला बढ़ाती हैं.

पाँच सालों में बहुत कुछ बदल गया. 28 साल की बेटी 33 की हो गई. घर पर उनकी तस्वीरें पुरानी हो गई हैं. पहले वह जेल से चिट्ठियां लिखा करती थी, वह अब बंद हो गई है. उनकी माँ कहती हैं, "अब वो ख़त नहीं भेजती क्योंकि जब मेरे पति उसे पढ़ते थे तो रोते थे. यह सोचकर कि अब्बू ख़त पढ़कर परेशान होंगे, उसने लिखना बंद कर दिया."

तसनीफ़ कहते हैं कि उनका सपना है कि वह एक दिन गुलफिशा को जेल के बाहर लेने जाएंगे. उन्हें अब भी इस बात का गर्व है कि "पाँच साल बाद भी लोग उसके बारे में पूछते हैं. लोग उसे भूले नहीं हैं.''

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